गरियाबंद अंचल की साहित्यिक कृतियों में व्यक्त देश एवं राष्ट्रीय भावना

 

डा (श्रीमती) ज्योति पांडेय1, श्रीमती अन्नपूर्णा देवांगन2

1शोध-निर्देशक, उप संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, मंत्रालय, अटल नगर, रायपुर (छ ग

2शोधार्थी, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ ग

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

Ÿाीसगढ़ का गरियाबंद जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ही सांस्कृतिक तथा साहित्यिक अवदानों के लिए प्रसिद्ध रहा है। आदिकाल से संपूर्ण Ÿाीसगढ़ की सभ्यता तथा संस्कृति की परिचायक तथा केंद्र-बिंदु रही। राजिम के आस-पास की भूमि भी पूर्वजों की इस विरासत को तभी से संरक्षित तथा सवंर्धित करती रही है। इस महानदी क्षेत्र में सिर्फ बहुमूल्य रत्नों का भंडार अवस्थित है वरन् अनेक ऐतिहासिक तथा पुरा-वैभव की गाथा आज भी दफन है। पद्म क्षेत्र राजिम का जितना धार्मिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व है, उतनी ही साहित्यिक प्रतिष्ठा भी है। पतीत-पावनी चित्रोत्पला महानदी ने जहाँ इस क्षेत्र की धरा को उर्वरा-शक्ति प्रदान कर धन-संपदा से समृद्ध किया, वहीं इस प्रक्षेत्र में जन्म लिए साहित्यिक मनीषियों के अवदानों की साक्षी भी रही। भक्तिकाल में महाप्रभु वल्लभाचार्य ने जिस भक्ति-धारा को प्रवाहित किया, उसमें केवल Ÿाीसगढ़ अपितु संपूर्ण भारत गोते लगाने लगा। अठारहवीं शताब्दी के Ÿारार्द्ध में गरियाबंद अंचल में पं. विश्वनाथ दुबे, सूर्योदय सिंह, क्षेमू प्रसाद वर्मा, गजाधर प्रसाद पौराणिक, प्यारेलाल दीक्षित जैसे साहित्य-सर्जकों ने राजिम क्षेत्र को साहित्यिक ऊँचाइयों की ओर अग्रसर किया।

 

KEYWORDS: गरियाबंद, साहित्य, राष्ट्रीय भावना।

 

 

प्रस्तावना

मराठा काल के अत्याचारों को सहते-सहते भारतीय जनता त्रस्त हो गई थी। ऐसे में ब्रिटिष शासन लागू होने के बाद जनता पर शोषण और अत्याचार और बढ़ गए। ब्रिटिश शासनकाल में केवल आर्थिक शोषण ही नहीं वरन् धार्मिक और सामाजिक भेदभाव भी होने लगा, जिससे संपूर्ण भारत की आत्मा के साथ ही Ÿाीसगढ़ का हृदय भी आहत हुआ। Ÿाीसगढ़ जो कि राष्ट्रीय मुख्य धारा से अलग तो नहीं, परंतु संपृक्त भी था, वह भी राष्ट्र-प्रेम की भावनाओं से ओत-प्रोत खून के आँसू रो रहा था।

मराठाकालीन अत्याचार के बाद अंग्रेजी शासन का शोषण और अत्याचार के विरूद्ध 1857 में सेना ने क्रांति कर राष्ट्रीय भावना पूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन का सूत्रपात कर दिया। गरियाबंद क्षेत्र में भी उस क्रांति के पश्चात् राष्ट्रीय भावना की लहर चलने लगी। पं. सुंदरलाल शर्मा केवल गरियाबंद जिले के नहीं वरन् संपूर्ण Ÿाीसगढ़ के राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूत थे। राजनैतिक और सामाजिक उत्थान के प्रणेता पं. सुंदरलाल शर्मा साहित्यिक पुनरुत्थान के सूत्रधार भी रहे। राजनैतिक जागरण की पृष्ठभूमि सामाजिक आंदोलनों के द्वारा तैयार होती है।       

 

पं. सुंदरलाल शर्मा ने राष्ट्रीय जागरण की पृष्ठभूमि सामाजिक धरातल से ही आरंभ किया। ‘‘केसरीऔरमराठाके नियमित पाठक पं. सुंदरलाल शर्मा में किशोरावस्था से ही राजनीतिक चेतना का प्रस्फुटन हो चुका था।’’1

 

बीसवीं शताब्दी में संपूर्ण भारत के साथ ही Ÿाीसगढ़ में भी राष्ट्रीय एकता और प्रेम की भावना बलवती होने लगी। पं. सुंदरलाल शर्मा पर लाल-बाल- पाल का गहरा प्रभाव था। नारायण राव मेधावाले, नत्थू जी जगताप, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे आजादी के दीवानों के साथ पं. सुंदरलाल शर्मा आजादी के समर में कूद गए। ‘‘राष्ट्रवादी भावना के चलते पं. सुंदरलाल शर्मा का स्वातंत्र्य आंदोलन से जुड़ना अत्यंत स्वाभाविक था। इस हेतु उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। सन् 1906 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।’’2

 

पं. सुंदरलाल शर्मा एक सच्चे राष्ट्र-भक्त के साथ ही उच्च कोटि के साहित्यकार भी थे। उन्होंनेसन्मित्र मंडलकी स्थापना की और ऐसे साहित्यिक रचनाओं का सृजन किया, जिससे लोक-मानस में जागृति आए। समाज में जन-जागृति लाने का कार्य रचनाकार वर्ग द्वारा ही किया जाता है। अपनी रचनाओं के माध्यम से देश-भक्ति का जज्बा पैदा करना उस समय के साहित्यकारों का प्रथम कर्Ÿाव्य था। गाँधीवादी विचारक पं. सुंदरलाल शर्मा जीवन-पर्यंत सत्य, अहिंसा, त्याग, अपरिग्रह की राह पर चलते रहे। गाँधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले पं. सुंदरलाल शर्मा लोक-मानस में राष्ट्रीय भावना जागृत करने में कोई कसर छोड़ी।

 

‘‘छोड़ो छोड़ो ये नौकरी को मेरे प्यारे भारत भाई

 सब धन को खो बैठे हैंे छोड़े हैं सारी कमाई

 छोड़ो...... छोड़ो।।

 धर्म छूटा ये कर्म छूटा,

 भारत को हो गई ये दुख भारी

 तुमरे बिना छोड़े से, पूरी होगी कमाई

 छोड़ो.... छोड़ो।।

 शराब छोड़ो, कपड़ा विदेशी छोड़ो

 खादी रूप बनाई

 स्वतंत्रता को ले लो, भारत की होगी भलाई।।’’3

 

Ÿाीसगढ़ के इस सपूत ने जहाँ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों में राष्ट्रीय भावना जागृत करने में कोई कमी की, वहीं 18 गाँव की अपनी जमींदारी को देश-सेवा हेतु न्यौछावर कर दिया। पं. सुंदरलाल शर्मा ने कई नाटकों की रचना और मंचन किया, सिर्फ इसलिए ताकि लोगों में राष्ट्र-प्रेम की भावना जाग सके।कंस-वधखंडकाव्य औरŸाीसगढ़ी दानलीलादोनों ही कृति पौराणिक पृष्ठभूमि पर आधारित किंतु वर्तमान परिस्थितियों से विमुख नहीं है। अंग्रेजी शासन द्वारा भारत की धन-संपदा को इंग्लैंड भेजना एक सच्चे भारतीय को गंवारा था। वे अंग्रेजी शासन पर कड़ा प्रहार करते हैं-

 

‘‘रैय्यत के धन चुवहके खरचै लाख करोर

 ढोंगी के बेटा बने रेंगै मूछ मरोर।’’4

 

कंस के रूप में अंग्रेजी शासन को चित्रित कर मातृभाषा Ÿाीसगढ़ी में ठेठ आंचलिकता लिए जहाँ मातृभाषा Ÿाीसगढ़ी को उसका मान-सम्मान दिलाने का एक अभिनव प्रयास था, तो वहीं पर लोगों में अंग्रेजी हुकूमत की सच्चाई को पहुँचा जागृति लाने की कोशिश रही सुंदर कवि की।

 

गरियाबंद अंचल में कवि पं. सुंदरलाल शर्मा के पश्चात् कुछ वर्षों तक साहित्यिक सुप्तता रही, जिसे कृष्णा रंजन, गजानंद प्रसाद देवांगन, पवन दीवान, रवि श्रीवास्तव, पुरुषोŸाम अनासक्त, काशीपुरी कुंदन तथा एकांत श्रीवास्तव सरीखे साहित्य-सर्जकों ने अपने पूर्वजों की विरासत को संभालने में अपनी जिम्मेदारी पूर्ण रूप से निभाई।

 

पं. सुंदरलाल शर्मा के पश्चातवर्ती रचनाकारों का बचपन भले ही ब्रिटिषकालीन भारत में गुजरा, पर उन्होंने स्वतंत्र भारत में होश संभाला। जहाँ पर राष्ट्रीय एकता, प्रेम, सौहार्द्र की भावना से परे साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, अत्याचार, वैमनस्यता आदि विसंगतियों से भारत के अन्य राज्यों के साथ ही Ÿाीसगढ़ प्रांत पर भी फैला था। समाज और देश की ऐसी दशा से व्यथित कवि-वर्ग की कलम शांत नहीं बैठ पाई-

 

‘‘हवाओं का रूख मोड़ कर मैं बढ़ा था

 पहाड़ों की छाती पर मैं ही बढ़ा था

 जहाँ पर भी मेरे कदम रूक गये थे

 वहां दुश्मनों के खम झुक गये थे

 तूफान में भी मैं जलता रहा हूँ

 बुझता हूँ मैं, लेकिन बुझता कहां हूं।’’5

 

देश-प्रेम की भाावना से भरे कवि कृष्णा रंजन एक सिपाही की आवाज बन जाते हैं। भारत माँ के लाल अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए उनके कदमों में अपना शीश न्यौछावर कर देने में संकोच नहीं करते हैं और कहते हैं ये बूझने वाले चिराग नहीं हैं। यू तूफानों से लड़ने वाले हौसले हैं। एक सिपाही की तरह अपनी अंतिम सांस तक दुश्मनों से लोहा लेने से नहीं कतराते-

 

‘‘मैं सोचा था यदि जिंदा रहा वतन में

 फूला समाता नहीं मैं चमन में

 मेरे शीश में जीत का सेहरा होता

 भारत से मिलता हुआ चेहरा होता।’’6

 

भारत माता की रक्षा और शान की खातिर अपने प्राणों का बलिदान करने वाला सैनिक कहता है कि काश मैं अपने वतन में ज़िंदा होता और मैं जीत का जश्न देख पाता, किंतु उसे अपने शहीद होने का भी गम नहीं। कवि कृष्णा रंजन एक सैनिक तो नहीं पर जन-सैनिक बन लोगों में राष्ट्र-भक्ति का जोश भरने की पुरजोर कोशिश करते हैं-

 

‘‘फहराता यह अमर तिरंगा, देता है संदेश

 आजाद हिंद के बेटों, तेरा यह गणतंत्र देश

 मेरे तीन रंगों की गाथा

 जिसको विश्व झुकाते माथा

 पहिचानो मूल्यांकन कर लो

 मेरा हर कण-कण से नाता

 देखो सबसे प्रेम करो, किसी को मत पहुंचाना ठेस

 भारत माँ के हाथों का, मैं विजय ध्वज विशेष

 आजाद हिंद के बेटों तेरा यह गणतंत्र देश।’’7

अमर तिरंगे की शान से स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते गजानंद प्रसाद देवांगन जन-मानस में प्रेम भावना का प्रचार करते हैं। इंसान को इंसान से प्रेम ही सिखाता है हमारा तिरंगा। शांति के समर्थक भारत के निवासियों से कवि आह्वान करते हैं कि किसी को दुख देने से अच्छा प्रेम करें, ताकि भारत में शांति व्यवस्था स्थापित हो सके-

 

‘‘एक हाथ में जिनके भाला

 दूजे में रखते हो माला

 दोनों को जिसने सम्हाला

 वही देश का रखवाला

 आफत आये राष्ट्र धर्म पर

 उठा लीजिये भाला

 शांति क्षणों में श्रद्धापूर्वक

 जपिये नित प्रभु नाम की माला।’’8

 

गाँधीवादी विचारों को मानने वाले कवि गजानंद प्रसाद शांति और अहिंसा पर जोर देते हैं, किंतु वक्त पड़ने पर भाला उठाने के लिए भी कहते हैं। शांतिदूत भारत ऋषि-मुनियों की भूमि रही है, किंतु विकट परिस्थितियों में यहाँ के ऋषियों ने भी भाला उठाने से परहेज नहीं किया। कवि उसी का स्मरण कराते अपनी रक्षा के लिए स्वयं को तैयार करने की बात कहते हैं। राष्ट्र-हित, समाज-हित शस्त्र उठाने के लिए आह्वान करते हैं कवि

 

‘‘तुझमें खेले गाँधी गौतम, कृष्ण राम बलराम

 मेरे देश की माटी तुझको सौ सौ बार प्रणाम

 सागर में दही भरा जैसे

 नदियों में दूध छलकता है

 यादें बच्चों की किलकारी

 दर्पण में रूप झलकता है

 Ÿार में झांझ झमकता है

 दक्षिण में बाजे बजते हैं

 पश्चिम मन ही मन गाता है

 पूरब का भाल दमकता है

 नव बिहान का सूरज बनकर चमके तेरा नाम

 मेरे देश की माटी तुझको सौ सौ बार प्रणाम।’’9

 

अपने देश की माटी को प्रणाम करने वाला संत-कवि पवन दीवान देश के चारों दिशा का गुणगान करता है। एक सच्चे देश-भक्त के हृदय वाले इस रचनाकार का संपूर्ण जीवन अपने देश और प्रदेश हित ही व्यतीत हुआ। राम-कृष्ण की इस भूमि में जहाँ गाँधी-गौतम का अवतरण केवल और केवल मानव-हित को हुआ। ऐसी माटी को प्रणाम करते नहीं थकते हैं पवन दीवान, किंतु देश की वर्तमान दशा से व्यथित भी दिखाई देते हैं-

 

‘‘मर-मर कर जीता है मेरा देश

 अंधियारा पीता है मेरा देश

 माटी के निश्छल पुत्रों को

 छल का दानव छलता है

 एक दिवस को और हार कर       

 असफल सूरज ढलता है

 यहाँ दाँव पर लगी दिशाएँ

 घर आकाश बेचता है

 खाली पेट तृप्ति भरने को

 मन विश्वास बेचता है।’’10

 

अपने देश और समाज-हित जिनका पूरा जीवन न्यौछावर हो गया, ऐसे संत-कवि पवन दीवान के हृदय में देश में छाई अराजकता, वैमनस्यता, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता के लिए विक्षोभ तो है, परंतु आक्रोश भी कम नहीं। Ÿाीसगढ़ का कवि समसामयिक समस्याओं के प्रति सजग होकर युग की परिस्थितियों से स्वयं लड़ता है और जन-मानस में जोश पैदा कर लड़ने का हौसला भरता है।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश अनेक समस्याओं से ग्रसित था, जिसमें एक अकाल की समस्या भी प्रमुख थी। अकाल की भयावह स्थिति से जूझते लोगों की व्यथा यहाँ के साहित्यकारों से छुपी नहीं वरन् वह तो उनकी वेदना से व्यथित दिखाई देता है। कवि पुरुषोŸाम अनासक्त अकाल की विभिशिका को व्यक्त करते कहते हैं-

 

‘‘इतिहास के चटके हुए दर्पण में

 स्मृतियों की घनी बस्तियां

 नंगी गलियों में ध्वस्त

 अरमानों का खानाबदोशी डेरा

 नंगे षरीर

 ढिबरी की तरह झपकती हुई

 कंदराई टिमटिमाती आँखें

 हड्डियाँ बजाते कंकाल

 छोटे-बड़े जिंदा भूत

 चिल्लाते भूख.... भूख.... भूख     

 Ÿिायाँ चबाते टुकुर-टुकुर ताकते

 लोकतंत्र के भावी संरक्षक।’’11

अकाल में देश की सर्व-साधारण जनता ही दुव्र्यवस्था और भूखमरी की शिकार होती है। अकाल पीड़ित देश में दुर्भिक्ष की विभिशिका तथा आम जनता की दशा का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करते कवि पुरुषोŸाम अनासक्त का हृदय उनके दुखानुभूति से पूर्ण दिखाई देते हैं। एक-एक दाने को तरसते लोग जो भूख की आग में जल रहे हैं, ऐसे बच्चों की पीड़ा जिसे कवि ने लोकतंत्र का भावी संरक्षक बताया है, से आहत हैं-

‘‘बच्चा बड़ा होकर सुनेगा

 मार्मिक कहानी

 पिता के शहीद होने की

 अपने ही देश की गोली से

 अनाथ हो जाने की

 उसकी मुट्ठी तनेगी

 कहानी सुनकर

 और ढीली पड़ जायेगी

 खून का घूंट पी कर

 माथे की नसें चटकने लगेंगी

 देश का अर्थ जानने की कोशिश में

 मानचित्र के सभी रंग

 उसे फीके लगेंगे।’’12

 

देश में फैली अराजकता, साम्प्रदायिकता जैसी विंसगतियाँ जो समाज को खोखला करती हैं, ऐसे समाज का सजग प्रहरी एक साहित्यकार सामाजिक मनोभावों से आबद्ध हर व्यक्ति के दुख में दुखी होता दिखाई देता है। कवि रवि श्रीवास्तव भी दंगे में अनाथ हुए उस बच्चे के मन की व्यथा को महसूसते कहते हैं कि वह बच्चा जब जानेगा कि उसके पिता की हत्या अपने ही देश की गोली से हुई है, तो उसके हृदय पर क्या गुजरेगी ? क्या वह उसे ही इस देश की सच्चाई  मानेगा ? इस तरह के प्रश्नों से भविश्य में उठाने वाले सवालों का जवाब ढूँढते कवि उस बच्चे की सोच पर प्रश्न-चिह्न लगाते हुए उसकी पीड़ा का एहसास कराने में सफलता प्राप्त करते हैं।

 

गरियाबंद अंचल पिछड़ा प्रदेश से अभिहित राज्य है, यहाँ के साहित्य-सर्जक अपने समय की परिस्थिति से विमुख नहीं हैं। अपने आस-पास ही नहीं देश में छाई विसंगतियाँ जहाँ उन्हें विद्रोह करने पर प्रेरित करती हैं, वहीं विडंबनाएँ इनमें आक्रोश और जोश भी पैदा करती हैं-

‘‘अजीब पागल है वे लोग-

 जो किसी शोक का आनंद उठाना चाहते हैं

 छोटी सी खुशी की खातिर

 जीवन भर मातम मनाना चाहते हैं

 उन्हें कौन बताए-

 कि सद्भाव और शांति

 के वातावरण को दूषित करना

 सत्कर्म नहीं होता है।

 जो धर्म, हत्या करने के लिये कहे

 वो धर्म नहीं होता

 देश की माटी पर ईश्वर पैदा होता है

 खेलता है  खड़ा होता है। 

 इसलिए हर धर्म से देश बड़ा होता है।’’13

 

देश को किसी भी धर्म से बड़ा बताने वाले व्यंग्यकार काशीपुरी कुंदन जहाँ समाज और देश की विषमताओं के प्रति विद्रोह प्रकट करते हैं, वहीं किसी भी धर्म को देश के बाद का तत्व मानते हैं। देश के अन्य राज्यों के अपेक्षाकृत यह Ÿाीसगढ़ राज्य शांत प्रदेश है, इसलिए यहाँ के निवासी शांति के समर्थ हैं। गरियाबंद क्षेत्र जहाँ के सीधे-सादे लोग शांतिपूर्वक जीवन-निर्वहन करने में विश्वास करते हैं, इसी बात का समर्थन कर लोगों को शांति के लिए आह्वान भी करते हैं। वे कहते हैं कि किसी की हत्या करना धर्म नहीं सिखाता। कवि लोगों को सचेत भी करते कहते हैं कि इसे सत्कर्म नहीं कहा जाता।

 

धर्म के नाम पर चल रहे साम्प्रदायिकता की भावना को लोगों के मानस से निकाल देने की कोशिश करते कवि ईश्वर के प्रति आस्था प्रकट करते हैं और जनता में राष्ट्रीय भावना जगाने का प्रयास भी करते हैं।

 

एकांत श्रीवास्तव इस क्षेत्र के युवा साहित्यकार हैं, वे एक नई दृष्टि से भारत का चेहरा देखते हैं-

 

‘‘कभी करो यात्रा तो देखो

 भारत का असली चेहरा

 अनारक्षित कूपों में

 मुक्तिबोध जिसे अजब तिरछी

 लकीरों से कटा चेहरा कहते हैं

 पोटलियां, पेटियां, झोले

 बोरे चावल के

 गट्ठे लकड़ियों

 फटे, पुराने कपड़ों

 गाँव जनपद के लोग

 इसी कूपे में फटता है बम

 दुर्घटना में/ये जब मरते हैं

 तो ठीक-ठाक संख्या भी

 पता नहीं चलती

 मृतकों की सूची में इनके नाम नहीं होते

 ये राख हो जाते हैं

 सामूहिक दाह संस्कार में

 इस तरह जलकर राख हो जाता है

 एक भारत।’’14

 

भारत का असली चेहरा दिखाते कवि एकांत श्रीवास्तव भारत की उस जनता को प्रस्तुत करते हैं, जो गरीब मजदूर ग्रामीण हैं और जिनका कोई अस्तित्व नहीं। इनके जीने और मरने से समाज में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। भारत के ऐसे वर्ग को प्रस्तुत कर एकांत श्रीवास्तव जन-मानस में उनके प्रति संवेदना जागृत करते हैं, जिनकी वेदना से किसी कोई सरोकार नहीं। ऐसे पीड़ित लोगों के लिए लोक-हृदय में पीड़ा पैदा करने की कोशिश करते हैं।

 

गरियाबंद अंचल के साहित्य-सर्जक पं. सुंदरलाल शर्मा, कृष्णा रंजन, गजानंद प्रसाद देवांगन, पवन दीवान, पुरुषोŸाम अनासक्त, रवि श्रीवास्तव, काशीपुरी कुंदन और एकांत श्रीवास्तव अपने समय की युगीन परिस्थितियों के प्रति आक्रोशित होकर विद्रोह भी करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर लोगों को अपने कर्म के प्रति सचेत भी करते हैं। जहाँ देश-भक्ति की भावना से ओत-प्रोत पं. सुंदरलाल शर्मा ब्रिटिष शासन पर कड़ा प्रहार करते हैं, वहीं इस अंचल के अन्य रचनाकार तात्कालीन स्थितियों से जूझते, संघर्ष करते नज़र आते हैं, किंतु फिर भी देश-प्रेम की भावना से विलग दिखाई नहीं देते, बल्कि देश के प्रति चिंतित नज़र आते हैं। 

 

संदर्भ-सूचीः

1.   पांडेय, ऋषिराज. युग प्रवर्तक पं.सुंदरलाल शर्मा समग्र. रायपुर: Ÿाीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी, 2017, पृ. 77.

2.   वही; पृ. 79.

3.   वही; पृ. 95.

4.   शर्मा, पं. सुंदरलाल. कंस वध (अप्रकाशित). पृ. 1.

5.   रंजन, कृष्णा. लोहा. रायपुर: सागर आफसेट, 2007, पृ. 76.

6.   वही; पृ. 76.

7.   देवांगन, गजानंद प्रसाद. सुशुम्नारायपुर: यश आफसेट, प्रथम संस्करण, 2014, पृ. 41.

8.   देवांगन, गजानंद प्रसाद. गीत तेरे नाम. रायपुर: वैभव प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2014, पृ. 33.

9.   दीवान, पवन. अंबर का आशीष. रायपुर: वैभव प्रकाशन, प्रथम संस्करण. 2010, पृ. 1.

10.  दीवान, पवन0. मेरा हर स्वर इसका पूजन. रायपुर: युगबोध प्रकाशन, प्रथम संस्करण, पृ. 42.

11.  अनासक्त, पुरुषोŸाम. अनामगंध. रायपुर: हस्ताक्षर प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1967, पृ. 37.

12.  श्रीवास्तव, रवि. पहाड़ पर चढ़ते पांव. इलाहाबाद: परिमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1946, पृ. 79.

13.  कुंदन, काशीपुरी. मुर्दों का प्रीतिभोज. राजिम: साहित्य महानदी, प्रथम संस्करण, 1987, पृ. 18.

14.  श्रीवास्तव, एकांत. नागकेसर का देश यह. नई दिल्ली: प्रकाशन संस्थान, द्वितीय संस्करण, 2016, पृ. 43.

 

 

 

Received on 04.06.2019            Modified on 11.06.2019

Accepted on 17.06.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):447-452.